Guru Gobind Singh Ji







गुरुवाणी पढ़नी चाहिये, लेकिन नाम सुमिरन बहुत जरुरी हैं। नाम जपने से सब कुछ प्राप्त हो जाता है।
नाम स्वयं जपना पड़ता है। जैसे जो भोजन करता है, वही तृप्त होता है।
नाम रसना द्वारा जपना चाहिये। फिर यह स्वयं ह्रदय में प्रवेश कर जाता है। गुरमुख की संगत इसे आसान कर देती है।
सुमिरन से पहले मन की मैल उतरती है, फिर इन्‍सान बुरे कामों से संकोच करने लगता है।
नाम में इन्‍सान को पवित्र करने की शक्ति है। नाम जपने से इन्‍सान बदल जाता है। लेकिन जिनमें नाम जपने से तब्दीली नहीं आई, समझो उन्होंने(इच्छा रहित हो कर) नाम जप नहीं किया।
नाम जपना ना छोड़ें। नाम को अपना जीवन बनायें। जितनी बार भूल हो क्षमा के लिये विनती करे।
जब अकेले बैठकर नाम जपना हो तो मूंह से इतनी धीमी आवाज निकालें जो आप के स्वयं के कान उसे सुन सकें। इस से एकाग्र होने में मदद मिलेगी।
नाम को सभी फल लगते हैं। गुरु पूरी समझ देता है।
नाम की महिमा कोई विरला ही समझता है।
नाम जपने वाले को सब्र, संतोष तथा विनम्रता की बड़ी जरुरत होती है।
नाम जप द्वारा ऋ‍‍द्धि सिद्धि प्राप्त हो जाती हैं। परंतु नाम जप करने वाला उनका प्रदर्शन करने से बचता है।
नाम जप के लिऐ सभी समय ठीक हैं परंतु ब्रह्म मुहुर्त (अमृत वेला) के समय इसका अधिक लाभ होता है। गुरुवाणी का पाठ दिन के समय करना-सुनना चाहिये।
यदि नाम जपने को बार-बार दिल करे तो समझें सुमिरन सफल हो रहा है। मन की मैल उतर रही है। ईश्वर तथा गुरु का शुक्र करें।
नेत्र बंद कर ‘वाहिगुरु' शब्द पर ध्यान एकाग्र करें । मन को ख्यालों से मुक्त करें, यह जरुरी है।
जहाँ तक हो सके, सीधे बैठें। रीढ़ की हड्डी सीधी रखकर पालथी मारकर बैठें। जितना संभव हो सके इस प्रकार बैठें।
नाम-गुरुवाणी का अभ्यास नहीं छोड़ना भले मन लगे या ना लगे। जो लगें रहेंगे वक्त आयेगा जब मन की एकाग्रता प्राप्त हो जायेगी। जो जिज्ञासु मध्यम गति से ही चलते रहेंगे उनके मंजिल पर पहुंचने की आस है।

 












Guru Nanak Dev Ji