यह पवित्र गुरुद्वारा शिकार घाट गुरुद्वारा से करीब डेढ़ मील की दूरी पर गोदावरी नदी के किनारे स्थित है। इस जगह का इतिहास भी गुरुद्वारा नगीना घाट के इतिहास की तरह ही है। एक दिन गुरु जी इस स्थान पर नदी के किनारे बैठे थे। हिंदुस्तान का मुगल शहंशाह बहादुर शाह भी गुरु जी के पास बैठा था। उसने गुरु जी को यहाँ एक बेशकीमती हीरा भेंट किया। उसके मन में कीमती भेंट करने का अभिमान था। महाराज ने उसके अभिमान को मिटाने के लिये उसके देखते-देखते हीरा नदी में फेंक दिया। शहंशाह के मन में रोष हुआ। उसने सोचा की गुरु जी को हीरें की परख नहीं है। .
गुरु जी ने बादशाह की निराशा दूर करने के लिये उसे नदी में झांकने के लिये कहा। जब शहंशाह ने नदी की ओर देखा तो उसे अनगिनत बेशकीमती हीरें नदी में पड़े नजर आये। उसका अहंकार चूर हो गया तथा उसने गुरु जी से अपनी गलत ख्याली के लिये माफी मांगी।. |
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