
गुरुद्वारा बंदा घाट साहिब
आप नांदेड़ आकर गोदावरी नदी के किनारे इस स्थान पर रहने लगे। प्राप्त की हुई शक्ति के बल पर आप आस-पास रहने वाले लोगों को तंग करने लगे। लोग आपकी शक्ति के कारण आपसे भयभीत होते। श्री गुरु गोबिंद सिंघ जी महाराज एक दिन अपने सिखों सहित बैरागी के आश्रम में आ पधारे। गुरु जी बैरागी के पलंग पर विराजमान हो गये। उस समय बैरागी जी नदी के किनारे कहीं बैठे हुये थे।
उनके शिष्यों ने गुरु जी से संबंधित सारा समाचार उन्हें आ सुनाया। सुनकर वे बहुत क्रोधित हुये। आश्रम में आकर उन्होंने अपनी शक्तियों के बल पर पलंग को उलटाना चाहा। किंतु दो जहान के मालिक सतगुरु जी के सामने उनकी एक न चली। अंत में वे गुरु जी के चरणों में गिर पड़े तथा गुरु जी से विनती की, “ महाराज अपने बंदे को सही रास्ते पर डालें।“ गुरु जी ने प्रसन्न हो कर उन्हें अमृतपान करवा कर अपना सिंघ बना लिया तथा आपका नाम गुरबख्श सिंघ रखा।
कुछ समय पश्चात गुरु जी ने बाबा गुरबख्श सिंघ जी को पांच तीर, २५ सिंघ, निशान साहिब तथा नगारा देकर उन्हे जत्थेदार बनाकर पंजाब की ओर मुगलों के जुल्मी शासन का अंत करने के लिये भेज दिया। बाबा बंदा सिंघ जी ने कई वर्षों तक मुगलो को नाकों चने चबवाये। पंजाब के कई इलाके फतेह किये। सरहंद को विशेष रुप से तबाह किया। अंत में आप जीवित अवस्था में मुगलों के हाथ लग गये। दिल्ली में आपको दिल दहलाने वाली यातनायें देकर शहीद कर दिया गया।
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