Guru Gobind Singh Ji


यह गुरुद्वारा सचखंड साहिब जी से थोड़ी दूरी पर गोदावरी के किनारे गुरुद्वारा नगीना घाट के समीप सुशोभित है। औरंगजेब की मौत के उपरांत उसके शहजादों के बीच दिल्ली के तख्त के ऊपर बैठने के लिये आपस में युद्ध छिड़ गया।शहजादा बहादुर शाह ने श्री गुरु गोबिन्द सिंघ जी को इस युद्ध में सिख फौज के साथ उसकी मदद करने के लिये विनती की। उस ने गुरु जी के साथ वायदा किया कि युद्ध जीत जाने पर जब बह दिल्ली के सिंहासन पर बैठेगा, तो औरंगजेब के समय में पंजाब में बेकसूर सिखों के ऊपर अत्याचार करने वाले दोषी हाकिमों को गुरु जी के हवाले कर देगा। गुरु जी की युद्ध में की गई मदद से बहादुर शाह की जीत हुई तथा वह हिंदुस्तान के शहंशाह के रुप में दिल्ली के तख्त पर विराजमान हुआ। उन्ही दिनों दक्षिण भारत में बगावत हो गई। उसने बगावत को कुचलने के लिये शाही फौज को लेकर दक्षिण की ओर कूच किया तथा गुरु जी को भी साथ चलने के लिये विनती की। तख्त हासिल कर लेने के बाद उसकी नीयत में खोट आ गई थी तथा वह दोषियों को गुरु जी के सुपुर्द करने से टाल-मटोल करने लग पड़ा था।.
गुरुद्वारा लंगर साहिब जी
का इतिहास
  संत  
  सिख इतिहास  
  सिख की पहचान  
  सिख गुरु  
 
SHRI GURU GOBIND SINGH JI
श्री गुरु गोबिन्द सिंघ जी


गुरु जी ने इस मुद्दे को हल करने हेतु उसके साथ ही दक्षिण भारत की ओर प्रस्थान किया। पड़ाव करते-करते बहादुर शाह तथा गुरु जी जब नांदेड़ पहुंचे थे तो उस वक्त गुरु जी की सेना के लिये इसी स्थान पर लंगर तैयार किया जाता था तथा फौजों को खि‍लाया जाता था जहाँ अब गुरुद्वारा लंगर साहिब सुशोभित है।
ख जगत में लंगर की प्रथा श्री गुरु नानक देव जी के समय में ही आरंभ हो गई थी। दूर-दूर से या आस-पास से गुरु जी के उपदेश सुनने के लिये तथा उनके दर्शन के लिये आने वाली संगत के लिये लंगर शुरु किया गया था। इसके अलावा गुरु का लंगर गरीबों तथा जरुरतमंद लोगों के लिये भी खुला था। ब्राह्मणों की पैदा की गई जाति-वर्ण की बांट को सिख धर्म में प्रवेश करने से रोकने हेतु गुरु जी ने हुक्म दिया था कि गुरु घर में आने वाले सभी लोग बिना किसी भेद-भाव के एकसाथ पंगत में बैठकर लंगर छकें। श्री गुरु अंगद देव जी के समय उनकी सुपत्‍नी माता खीवी जी लंगर का प्रबंध स्‍वयं देखती थीं।

‘सत्‍ते तथा बलवंड की वार’ श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी में दर्ज है जिस में इस बात का जिक्र किया गया है कि माता खीवी जी के कुशल प्रबंध में उस समय लंगर में शुद्ध देसी घी की बनी हुई खीर सर्व कि जाती थी। श्री गुरु अमरदास जी महाराज ने तो अपने समय में यह हुक्म ही कर दिया था कि जो भी उनके दर्शन करना चाहता है, वह पहले पंगत में बैठकर लंगर छके फिर ही उसे उनके दर्शन हो सकेंगे। यह हुक्म छोटे-बड़े, अमीर-गरीब, उच्च तथा नीच जाति वाले सभी के लिया था। यहाँ तक कि उस समय का हिन्दुस्थान का मुगल बादशाह अकबर भी जब गुरु जी के दर्शन करने के लिये श्री गोइंदवाल साहिब आया था तो उसने भी पंगत में बैठकर पहले लंगर छका तथा फिर गुरु जी के दर्शन करके निहाल हुआ था। हर तरह का योग्य तथा कुशल प्रबन्ध देखकर बह बहुत प्रसन्न हुआ था। प्रजा का मालिक जो था।

इतिहास गवाह है कि श्री गुरु गोबिन्द सिंघ जी महाराज ने सचखंड गमन करने से पहले लंगर का महत्व बताते हुये सिखों को हुक्म दिया था कि इस प्रथा को चालू रखा जाये। भाई संतोख सिंघ जी को स्वयं आपने श्री हजुर साहिब की जिम्मेदारी सौंपी थी तथा लंगर चालू रखने का आदेश दिया था। भाई साहिब जी ने हाथ जोड़कर गुरु जी को विनती की थी “सच्चे पातशाह देश के इस हिस्से में खालसा निवास नही करता तो फिर लंगर यहाँ कैसे चलेगा तथा उसका खर्च कहाँ से पूरा होगा ?” गुरु जी ने भाई साहिब को इस बात का फिक्र ना कर अपनी ड़युटी पूरी करने का आदेश दिया था। उन्होनें उस वक्त भाई संतोख सिंघ जी को कुछ भविष्यवाणियाँ करते हुये विश्वास दिलाया था कि देश का यह हिस्सा खालसे की होंद से वंचित नही रहेगा। यदि आवश्यक्ता पड़ी तो वे स्वयं वक्त पर कुछ महापुरुषों को इस जगह भेजेंगे ताकि लंगर यहाँ पक्के तौर पर चलता रहे। कालांतर में लंगर की प्रथा से सिख असावधान हो गये तथा अन्य सेवाओं, जैसे कि गुरुद्वारों का निर्माण, बुंगो की उसारी आदि में व्यस्त हो गये।

सन् १९१२ में जब संत बाबा निधान सिंघ जी पंजाब वापस जाने के लिये नांदेड़ रेलवेस्टेशन में बैठकर गाड़ी का इंतजार करते हुये परमात्मा के भजन-सुमिरन में लीन थे, उस समय श्री गुरु गोबिन्द सिंघ जी नें उन्हे प्रत्यक्ष दर्शन देकर पंजाब वापस जाने से मना किया था तथा आदेश दिया था कि हमारे प्राचीन लंगर स्थान पर जाकर लंगर शुरु करो। उस समय श्री हजुर साहिब में दर्शन करने हेतु कोई-कोई श्रद्धालु ही आया करते थे क्योंकि यातायात के साधनों की कमी भी। जहाँ अब गुरुद्वारा लंगर साहिब सुशोभित है, वहाँ उस समय घना जंगल हुआ करता था। अतः बाबा निधान सिंघ जी ने गुरु जी से विनती की, ‘सच्चे पातशाह लंगर का खर्च कहाँ से पूरा करुँगा?’’

गुरु जी ने बाबा जी को वरदान दिया, ‘‘खीसा मेंरा हाथ तेरा।’’ अर्थात आप लंगर तैयार करके वितरित करने का प्रबंध करो, खर्च पूरा करने की जिम्मेदारी मेरी होगी। गुरु जी का हुक्म मान कर बाबा जी इस स्थान पर आ गये। सिदक तथा भरोसे से उन्होंने यहाँ लंगर शुरु किया। उनकी सच्ची लगन तथा गुरु जी के वचनों के प्रभाव के कारण तब से जो लंगर उन्होंने शुरु किया, वह आज तक निर्बाध चल रहा है। लंगर २४ घंटे चालू रहता है। अब तो दिन भर गरम चाय भी लंगर में वितरित की जाती है। मौजुदा प्रबंधक संत बाबा नरिंदर सिंघ जी के कठोर परिश्रम, साधना तथा गुरु कृपा सदका पिछले कुछ वर्षों से पूरा लंगर शुद्ध देसी घी में तैयार किया जाता है। दुसरा घी तेल डेरे में बिल्कुल प्रयुक्त नही किया जाता। संगत प्रत्यक्ष देख रही है कि रोजाना हजारो की संख्या में यात्री गुरु के लंगर में भोजन करते हैं लेकिन कभी कमी नहीं होती। इतना बड़ा डेरा होने के बावजूद साफ-सफाई का खास ख्याल रखा जाता है।

दूर-दूर से सफर कर के संगत जब यहाँ पहुंचती है तो गुरुघर में मिलने वाली सुख सुविधाओं के कारण उन्हें महसूस होता है, जैसे वे अपने घर में ही बैठी हों। यहाँ गुरु घर में किसी प्रकार का भेद-भाव नही किया जाता। प्यारी संगत जी, यह सब कुछ गुरु घर को समर्पित महापुरुषों, गुरु घर के निष्काम सेवकों के कठोर परिश्रम से हो रहा है। ‘ गुरुसिखां अंदर सतगुरु वरते’ के महावाक्य के अनुसार सतगुरु पातशाह स्वयं उनके अंदर बैठकर अपनी प्यारी संगत के लिये हर प्रकार की सुख-सुविधाका प्रबन्ध कर रहे हैं।













Guru Nanak Dev Ji