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लंगर हॉल का दृश्य |
इतिहास गवाह है कि श्री गुरु गोबिन्द सिंघ जी महाराज ने सचखंड गमन करने से पहले लंगर का महत्व बताते हुये सिखों को हुक्म दिया था कि इस प्रथा को चालू रखा जाये। भाई संतोख सिंघ जी को स्वयं आपने श्री हजुर साहिब की जिम्मेदारी सौंपी थी तथा लंगर चालू रखने का आदेश दिया था। भाई साहिब जी ने हाथ जोड़कर गुरु जी को विनती की थी “सच्चे पातशाह देश के इस हिस्से में खालसा निवास नही करता तो फिर लंगर यहाँ कैसे चलेगा तथा उसका खर्च कहाँ से पूरा होगा ?” गुरु जी ने भाई साहिब को इस बात का फिक्र ना कर अपना कर्तव्य पुरा करने का आदेश दिया था।
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निष्काम सेवा करते यात्रि |
श्री गुरु गोबिन्द सिंघ जी नें उन्हे प्रत्यक्ष दर्शन देकर पंजाब वापस जाने से मना किया था तथा आदेश दिया था कि हमारे प्राचीन लंगर स्थान पर जाकर लंगर शुरु करो। उस समय श्री हजुर साहिब में दर्शन करने हेतु कोई-कोई श्रद्धालु ही आया करते थे क्योंकि यातायात के साधनों की कमी भी। जहाँ अब गुरुद्वारा लंगर साहिब सुशोभित है, वहाँ उस समय घना जंगल हुआ करता था। अतः बाबा निधान सिंघ जी ने गुरु जी से विनती की, ‘सच्चे पातशाह लंगर का खर्च कहाँ से पूरा करुँगा?’’ गुरु जी ने बाबा जी को वरदान दिया, ‘‘खीसा मेंरा हाथ तेरा।’’ अर्थात आप लंगर तैयार करके वितरित करने का प्रबंध करो,
खर्च पूरा करने की जिम्मेदारी मेरी होगी।
गुरु घर के निष्काम सेवक |
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गुरु जी का हुक्म मान कर बाबा जी इस स्थान पर आ गये। सिदक तथा भरोसे से उन्होंने यहाँ लंगर शुरु किया। उनकी सच्ची लगन तथा गुरु जी के वचनों के प्रभाव के कारण तब से जो लंगर उन्होंने शुरु किया, वह आज तक निर्बाध चल रहा है। लंगर २४ घंटे चालू रहता है। अब तो दिन भर गरम चाय भी लंगर में वितरित की जाती है। मौजुदा प्रबंधक संत बाबा नरिंदर सिंघ जी के कठोर परिश्रम, साधना तथा गुरु कृपा सदका पिछले कुछ वर्षों से पूरा लंगर शुद्ध देसी घी में तैयार किया जाता है।र का भेद-भाव नही किया जाता।
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शुद्ध देसी घी में बना लंगर |
दुसरा घी तेल डेरे में बिल्कुल प्रयुक्त नही किया जाता। संगत प्रत्यक्ष देख रही है कि रोजाना हजारो की संख्या में यात्री गुरु के लंगर में भोजन करते हैं लेकिन कभी कमी नहीं होती। इतना बड़ा डेरा होने के बावजूद साफ-सफाई का खास ख्याल रखा जाता है। दूर-दूर से सफर कर के संगत जब यहाँ पहुंचती है तो गुरुघर में मिलने वाली सुख सुविधाओं के कारण उन्हें महसूस होता है, जैसे वे अपने घर में ही बैठी हों। यहाँ गुरु घर में किसी
प्रकार का भेद-भाव नही किया जाता।
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गुरु घर के निष्काम सेवक
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प्यारी संगत जी, यह सब कुछ गुरु घर को समर्पित महापुरुषों, गुरु घर के निष्काम सेवकों के कठोर परिश्रम से हो रहा है। ‘ गुरुसिखां अंदर सतगुरु वरते’ के महावाक्य के अनुसार सतगुरु पातशाह स्वयं उनके अंदर बैठकर अपनी प्यारी संगत के लिये हर प्रकार की सुख-सुविधा का प्रबन्ध कर रहे हैं।
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